ज़िन्दगी के मायने

आज जो कुछ लिखा है वक़्त हो तो ज़रूर पढ़िये।
कभी कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसा देखने को मिल जाता है,जो बेहद दुखदायी होने के साथ साथ अंदर से हिलाकर रख देता है, और बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है। कभी ज़िन्दगी बहुत छोटी चीज़ लगती है। उसका कारण शायद ये हो सकता है कि जिस दुनिया में अब हम रह रहे हैं, या यूं कहें कि जिन हालातों से दुनिया गुज़र रही है, या हम आज जिस तरह के दौर में रह रहे हैं वहां ज़िन्दगी कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं रह गयी है।

ज़िन्दगी की एहमियत

चारों तरफ ज़िन्दगी से ज़्यादा मौत की खबरें हैं। जितनी जानें जा रही हैं अखबारों से लेकर टीवी तक मौत ही मौत है। उसके सामने ज़िन्दगी बड़ी छोटी चीज़ लगती है लेकिन कभी कभी एक ख़बर या किसी का दुनिया से अचानक चले जाना काफी कुछ सोचने को मजबूर कर देता है। किसी इंसान या किसी परिवार के लिए किसी की ज़िन्दगी कितनी ज़रूरी हो सकती है हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

किसी के अचानक दुनिया से जाने की खबर हमारे लिए बहुत मामूली सी या आई गई खबर हो सकती है, लेकिन हम सोच भी नहीं सकते कि उसका जाना कितने लोगों की ज़िंदगी को बर्बाद कर चुका होगा? या कितनी जिंदगियां ऐसी होंगी? जो उसके जाने से हमेशा के लिए बदल जाएंगी और बेबस भी हो जायेंगी।

कल 02/07/2021 को एक ख़बर मिली, कि हमारे एक बेहद करीबी परिवार में अचानक से उनके बड़े बेटे की पत्नी की तबियत बहुत खराब है। उसकी आंत फट गई थी और बहुत बुरी हालत थी।

चिकित्सा की दयनीय हालत

देश और दिल्ली की चिकित्सा की पोल तो कोरोना की दूसरी लहर में खुल ही चुकी थी, इसलिए इनको भी बहुत दिक्कत हुई पहले फोर्टिस, फिर होली फैमिली और वहां से मालवीय नगर और उसके बाद सफदरजंग और सफदरजंग के बाद यहां से वहां भटकने के आखरी पड़ाव के लिए आखिरकार बिना बेड मिले AIIMS में बड़ी मुश्किल से इलाज शुरू हो पाया।

उसके बाद फिर बेड का इंतज़ाम हुआ और बाद में वेंटिलेटर पर रख दिया गया। ब्लडप्रेशर स्टेबल नहीं था तो ऑपरेशन नहीं हो पाया और प्रॉब्लम बढ़ती चली गयी। एक बार आपरेशन को लेकर भी गए लेकिन दर्द की अधिकता के कारण एनेस्थीसिया का कोई असर नहीं हुआ। एक कट लगाने के बाद उसका ऑपरेशन टल गया और उस कट में टांके लगा दिए गए।

ये सब AIIMS में हो रहा था जहां हमारी सबसे अच्छी मेडिकल सुविधाएं हैं। उसकी हालत बिगड़ती गयी और आखिरकार उसने अपनी अंतिम सांस उसी वेंटिलेटर पर ली। शाम होते होते उसकी ज़िन्दगी की भी शाम हो गई। सुनकर बहुत दुःख हुआ और उस बेटे का बड़ा ख़याल आया जो लगभग निढाल था।

कैसे किसी एक के जाने से कितने लोग अधूरे हो जाते हैं।

उनकी ज़िन्दगी किसी कहानी की तरह सामने आ गई। दोनो ने एक दूसरे को पसंद करने के बाद शादी की थी और एक दूसरे को बेहद प्यार करते थे। उनकी वो बॉन्डिंग अक्सर देखने को भी मिलती थी, अधिकतर वक़्त दोनों साथ गुज़ारते थे। साथ मे घूमना फिरना और बहुत सारा वक़्त एक दूसरे के साथ व्यतीत करना।

उनकी एक 4 या 5 साल की बेटी है जिसकी तस्वीर इस लड़की ने अपनी डीपी पर लगा रखी थी जिसको छोड़कर वो इस दुनिया से जा चुकी थी। रह रहकर उस बच्ची का खयाल आ रहा था कि कुदरत ने उसके साथ कैसा अन्याय कर दिया शायद उस मासूम को इसकी खबर तक नहीं होगी।

उस बच्ची के चेहरे ने रात भर सोने नहीं दिया कुछ हेल्थ इश्यूज की वजह से वहां जा तो नहीं पाया लेकिन फिर भी पता नहीं, कैसे वो दर्द महसूस हो रहा था? बार बार उसकी अंतिम वीडियो सामने आ रही थी जिसमे वो वेंटिलेटर पर ज़िन्दगी से निढाल लेटी हुई थी, ज़िन्दगी के हर दर्द हर परेशानी से बेख़बर।

समाजसेवा के जज़्बे और शायद लोगों से अटैच रहने के कारण अब उतनी मज़बूती नहीं रही है जो शायद पहले थी। खबरों को सुनकर आगे बढ़ने की दशा अब नहीं है। हर खबर खुद से जुड़ी हुई महसूस होने लगती है और उससे जुड़ा दर्द भी महसूस होने लगता है और वही दर्द ही अपने जज़्बात लिखने को भी मजबूर करता है। और वही दर्द ही समाज के लिए कुछ करने को भी प्रेरित करता है।

किसी को देखकर उसके दर्द का अंदाज़ा लगाना कितना मुश्किल होता है।

कभी कभी कुछ घटनाएं ज़िन्दगी के प्रति सोचने के नज़रिए को बदल देती हैं।परिवार में किसी के जाने का इस परिवार पर क्या असर हो सकता है हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हैं। कोई किसको कितना प्यार करता है और उसके लिए क्या क्या कर जाता है हम सोच भी नहीं सकते।

एक किस्सा आपसे शेयर करता हूँ उससे अंदाज़ा लगाना आसान होगा। अपने लखनऊ के पहले दौरे पर जब में गया तब काफी उत्साहित था आखिर उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के बावजूद कभी जा नहीं पाया था। उसके दो कारण थे न तो वहां कोई रिश्तेदार रहता है और न ही किसी ऐसे व्यवसाय से जुड़ा हूँ जो उसके लिए मुझे लखनऊ जाना पड़े।

जैसे ही रेलवे स्टेशन से बाहर निकला एक शख्स ने पैसे मांग लिए में जेब मे 5 या 10₹ ढूंढ ही रहा था वो अनायास बोला भाईसाहब 100₹ दे दो मेरा इंजेक्शन आ जायेगा मेरा हाथ वहीं रुक गया और मैने गुस्से से उसे घूरा और कहा तूने सोच भी कैसे लिया कि तेरे नशे के लिए में अपनी मेहनत की कमाई दूंगा दफा हो यहां से।

वो बोला भाईसाहब में ज़रूरतमंद हूँ और उस ज़रूरत ने मुझे भिखारी बना दिया है और ये इंजेक्शन नशे के लिए नहीं है मेरी बीवी बहुत ज़्यादा बीमार है उसके जो इंजेक्शन प्रतिदिन लगता है वो 750₹ का आता है में कारपेंटर हूँ 450₹ प्रतिदिन पर काम करता हूँ मैने अपनी बीवी के इलाज के लिए सबसे गुज़ारिश की एडवांस पैसे मांगे जिसके पास काम करता था उसके पास खुद को गिरवी रखने के लिए भी कहा।

मेने उसको कहा कि वो मुझसे जब तक काम करवा सकता है जब तक उसका एक एक पैसा न चुका दूँ चाहे वो 400₹ प्रतिदिन दिहाड़ी दे दे। लेकिन उसने भी मना कर दिया। सब अपनों ने भी बहाने बनाकर मुझे इस परेशानी में अकेला छोड़ दिया। भाईसाहब मेने सोच लिया कि मुझे अपनी बीवी की जान तो बचानी ही है चाहे उसके लिए भीख ही क्यों न मांगनी पड़े, और अब वही कर रहा हूँ।

उसने आगे कहा कि पिछले 2 महीने से लगातार इंजेक्शन का इंतज़ाम हो भी जाता है दवा भी आती है और कुछ और भी खर्च हैं ऊपरवाला मुझे मायूस नहीं करता इतने सब हालातों के बाद उसकी ऊपरवाले के प्रति श्रद्धा मुझे अजीब भी लगी। उसके बाद उसने पेपर निकाले मुझे दिखाए। में बस शर्मिन्दी में खामोश खड़ा रहा। कुछ बोलने को अगर मेरे पास अल्फ़ाज़ होते तो ज़रूर बाहर आते लेकिन मेरे पास बोलने को कुछ नहीं था, इसलिए चुपचाप सुनता रहा।

उसका उसकी बीवी के लिए प्यार और उसकी परेशानी ने दिल के अंदर हलचल पैदा कर दी थी। मैंने उस समय सारी दुनिया के साथ साथ स्वयं को भी एकदम खाली पाया। केवल एक वही शख्स भरा हुआ लगा। मानवता से, प्रेम से, ज़िम्मेदारी से, और बहादुरी से।

जब उसने बोलना समाप्त किया तो मैने देखा मेरी तो आंखें गीली थीं वो इतने सब हालातों के बाद भी हिम्मत से खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखें गीली तो नहीं हुईं लेकिन उसका गला ज़रूर सूख गया था। मुझे लगा शायद उसकी आंखें अब थक चुकी हों इतना कुछ देख लिया हो कि सब दर्द बह गया हो मैंने पास से पानी की एक बोतल खरीदी और उसको पीने को दी। जब उसने पानी पी लिया तो मैंने उससे कहा कि भाई माफ करना मैंने गलत समझा था।

कौन कितना दर्द लिए बैठा है कौन जानता है

वो मुस्कुरा दिया उसकी वो मुस्कुराहट मुझे और शर्मिंदा महसूस करवा रही थी। फिर वो भाईसाहब कोई बात नहीं अब तो लोगों की दुत्कार सुनने की आदत पड़ गयी है। और मेरे हाथ से पैसे लेकर आगे बढ़ गया मैं उसे जाते देखता रहा, और वो मेरे ही सामने सड़क पार करके कहीं गुम हो गया। उसकी थोड़ी सी मदद की और उस छोटी मदद से भी बहुत बड़ा सुकून महसूस हुआ।
और एक बात और पता लगी कि किसी की ज़िंदगी के किसी के लिए क्या मायने हो सकते हैं, हम अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं।

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Bolnatohai

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